HBD: ‘प्रिंस ऑफ पोर्ट ऑफ स्पेन’, जिसने क्रिकेट के कैनवस को अपनी कला से सजाया

“मैं जब बल्लेबाज़ी करता हूँ, तो चाहता हूँ कि दर्शक मेरी कला का आनंद लें”: ब्रायन लारा

2 मई, 1969 को त्रिनिदाद में जन्मे ‘प्रिंस ऑफ पोर्ट ऑफ स्पेन’ ब्रायन चार्ल्स लारा आज 57 वर्ष के हो गए हैं। लारा सिर्फ एक क्रिकेटर नहीं थे, वह क्रिकेट के कैनवस पर रंग बिखेरने वाले एक ऐसे चित्रकार थे, जिसकी हर ‘ड्राइव’ एक पेंटिंग जैसी और हर ‘कट’ एक कविता जैसा लगता था। उनकी कलाईयों की जादूगरी और टाइमिंग का सौंदर्य आज की टी-20 और पावर-हिटिंग के दौर में भी एक पुरानी, सुकून भरी याद की तरह है।

आंकड़ों से परे लारा का जादू:

375 (1994): सर गैरी सोबर्स का 36 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़कर उन्होंने दुनिया को बता दिया कि एक नया बादशाह आ चुका है।

501:* प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 500 का आंकड़ा छूना आज भी कल्पना से परे लगता है, लेकिन लारा के लिए यह उनकी मानसिक दृढ़ता का प्रमाण था।

400 (2004):* आलोचकों की परवाह किए बिना, एंटीगुआ की उसी पिच पर वापसी करना, जहाँ उन्होंने 375 बनाए थे, यह दर्शाता है कि लारा गिरकर संभलना बखूबी जानते थे।

अकेले लड़ने वाला योद्धा:
ब्रायन लारा की सबसे बड़ी त्रासदी और गौरव दोनों ही यह रहा कि उन्होंने वेस्टइंडीज क्रिकेट के ‘पतन’ के दौर में बल्लेबाजी की। जब पूरी टीम ताश के पत्तों की तरह ढह रही होती थी, तब लारा एक छोर पर ‘तूफान में दीपक’ की तरह जलते रहते थे। 1998-99 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी पारियां या 2001 में श्रीलंका की टर्निंग पिच पर अकेले दम पर दोहरा शतक, लारा ने हमेशा अकेले मोर्चे को संभाला।

भारतीय नजरिया और एक अनकही कड़वाहट:
यह एक विडंबना ही है कि भारतीय दर्शक लारा के उस प्रभाव को उस गहराई से नहीं समझ पाए, जैसा वे रिकी पोंटिंग, हेडन या गिलक्रिस्ट के ‘शोर’ को लेकर रखते थे। शायद इसलिए कि लारा की बल्लेबाजी में ‘धुआंधार’ आक्रामकता के बजाय ‘शालीन’ और ‘ठहराव वाली’ कलात्मकता थी। अपने लंबे करियर (1990-2006) में लारा भारत में केवल 3 टेस्ट मैच खेल पाए, जिसने भारतीय प्रशंसकों को उन्हें करीब से देखने का बहुत कम मौका दिया।

एक कप्तानी और विदाई का दर्द:
लारा का कप्तानी करियर विवादों और बोर्ड से टकरावों से भरा रहा। 2007 वर्ल्ड कप की वह कड़वी विदाई, जो एक महान खिलाड़ी को कतई नहीं मिलनी चाहिए थी, आज भी क्रिकेट फैंस को खलती है। उन्हें उस स्तर का सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे।

जन्मदिन पर एक सलाम:
आज के दौर में जब क्रिकेट ‘पावर’ और ‘स्ट्राइक रेट’ तक सिमट गया है, ब्रायन लारा का नाम याद करना हमें यह सिखाता है कि क्रिकेट सिर्फ रनों का खेल नहीं है, यह अपनी कला को मैदान पर जीने का नाम है।

विकट परिस्थितियों को भी जो अपने आगे झुकने पर मजबूर कर दे, ऐसे महान बल्लेबाज को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं।

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