अजिंक्य रहाणे को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे: सुनील गावस्कर

अजिंक्य रहाणे

भारतीय क्रिकेट के महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने पूर्व कप्तान अजिंक्य रहाणे को भावुक अंदाज में विदाई देते हुए कहा है कि उन्हें अपनी कप्तानी के लिए कभी वह सम्मान और सराहना नहीं मिली, जिसके वे वास्तव में हकदार थे।

पिछले सप्ताह क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास की घोषणा करने वाले रहाणे ने अपने करियर में कई यादगार पारियां खेलीं। हालांकि, भारतीय क्रिकेट इतिहास में उनकी सबसे बड़ी विरासत 2020-21 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हासिल की गई ऐतिहासिक बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी जीत मानी जाती है।

रहाणे की कप्तानी में चोटों से जूझ रही भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया को उसी के घर में 2-1 से हराया था। गावस्कर का मानना है कि इतनी बड़ी उपलब्धि के बावजूद रहाणे की नेतृत्व क्षमता को कभी पर्याप्त श्रेय नहीं दिया गया।

छह टेस्ट में चार जीत, एक भी हार नहीं

मिड-डे के लिए लिखे अपने कॉलम में गावस्कर ने रहाणे के कप्तानी रिकॉर्ड को असाधारण बताया।

रहाणे ने छह टेस्ट मैचों में भारत की कप्तानी की। इनमें भारतीय टीम ने चार मुकाबले जीते, जबकि उनकी कप्तानी में भारत को एक भी टेस्ट मैच में हार का सामना नहीं करना पड़ा।

गावस्कर ने रहाणे की तुलना राहुल द्रविड़ से करते हुए कहा कि दोनों कप्तानों ने भारत को कई शानदार जीत दिलाईं, लेकिन उनकी कप्तानी को उतनी सराहना नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी।

गावस्कर ने लिखा कि जिस तरह राहुल द्रविड़ की कप्तानी में मिली बड़ी जीतों को पर्याप्त श्रेय नहीं दिया गया, उसी तरह रहाणे की नेतृत्व क्षमता भी प्रशंसा से वंचित रह गई।

जीत का श्रेय खिलाड़ियों को, हार की जिम्मेदारी कप्तान पर

गावस्कर ने भारतीय क्रिकेट में कप्तानी को लेकर अपनाए जाने वाले दोहरे रवैये की भी आलोचना की।

उनके अनुसार, जब टीम जीतती है तो बल्लेबाजों और गेंदबाजों की व्यक्तिगत उपलब्धियों की चर्चा होती है। लेकिन जब टीम हारती है तो सारा दोष कप्तान और कोच पर डाल दिया जाता है।

यही कारण रहा कि ऑस्ट्रेलिया में ऐतिहासिक सीरीज जीत के दौरान भी रहाणे की रणनीति, संयम और नेतृत्व को उतनी प्रमुखता नहीं मिली।

36 रन पर ढेर होने के बाद संभाली थी टीम

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उस सीरीज की शुरुआत भारतीय टीम के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं थी।

एडिलेड में खेले गए पहले टेस्ट की दूसरी पारी में भारत सिर्फ 36 रन पर ऑलआउट हो गया था। यह टेस्ट क्रिकेट में भारतीय टीम का सबसे कम पारी स्कोर था।

इस शर्मनाक हार के बाद नियमित कप्तान विराट कोहली अपने पहले बच्चे के जन्म के कारण भारत लौट गए। इसके बाद टीम की कमान अजिंक्य रहाणे को मिली।

गावस्कर ने कहा कि रहाणे और तत्कालीन मुख्य कोच रवि शास्त्री ने मिलकर उस टीम को निराशा से बाहर निकाला, जो एडिलेड की हार के बाद पूरी तरह टूट चुकी थी।

मेलबर्न में कप्तानी पारी ने बदली सीरीज

कप्तानी संभालने के बाद रहाणे ने केवल रणनीति से ही नहीं, बल्कि अपने बल्ले से भी टीम का नेतृत्व किया।

मेलबर्न में खेले गए दूसरे टेस्ट में उन्होंने दबाव के बीच शानदार शतक लगाया। उनकी यह पारी भारत की जीत की नींव बनी और टीम ने सीरीज में जबरदस्त वापसी की।

यह शतक केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था। इसने भारतीय ड्रेसिंग रूम को विश्वास दिलाया कि एडिलेड की हार के बावजूद टीम ऑस्ट्रेलिया को चुनौती दे सकती है।

इसके बाद सिडनी टेस्ट में भारत ने चोटों और दबाव के बीच ऐतिहासिक ड्रॉ हासिल किया।

चोटिल खिलाड़ियों के साथ गाबा में रचा इतिहास

सीरीज के निर्णायक गाबा टेस्ट तक भारतीय टीम के अधिकांश प्रमुख खिलाड़ी चोटिल हो चुके थे। टीम के पास कई नियमित गेंदबाज उपलब्ध नहीं थे और अनुभवहीन खिलाड़ियों के साथ मैदान पर उतरना पड़ा।

इसके बावजूद रहाणे की कप्तानी में भारत ने ब्रिस्बेन के गाबा मैदान पर ऑस्ट्रेलिया को हरा दिया।

ऑस्ट्रेलिया को इस मैदान पर लगभग 32 वर्षों से किसी टेस्ट मैच में हार नहीं मिली थी। लेकिन युवा और अनुभवहीन भारतीय टीम ने इस दुर्ग को भी भेद दिया।

गावस्कर ने रहाणे की कप्तानी की प्रशंसा करते हुए लिखा कि उन्होंने एक ऐसे जहाज की कमान संभाली थी, जो डूबने के करीब था। रहाणे न केवल उसे शांत पानी में लेकर आए, बल्कि भारत को गाबा में ऐतिहासिक जीत और सीरीज भी दिलाई।

‘कोई भी खिलाड़ी अपरिहार्य नहीं’

गावस्कर ने कहा कि गाबा की जीत ने एक बार फिर साबित कर दिया कि क्रिकेट में कोई भी खिलाड़ी अपरिहार्य नहीं होता। भारतीय टीम के कई बड़े नाम निर्णायक मुकाबले में उपलब्ध नहीं थे। इसके बावजूद युवा खिलाड़ियों ने जिम्मेदारी संभाली और भारत को टेस्ट इतिहास की सबसे यादगार जीतों में से एक दिलाई।

इस सफलता के पीछे रहाणे की शांत कप्तानी, खिलाड़ियों पर भरोसा और दबाव के बीच सही फैसले लेने की क्षमता की बड़ी भूमिका थी।

बिना किसी विवाद के विदा हुए रहाणे

गावस्कर ने रहाणे के व्यक्तित्व की भी जमकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि बहुत कम क्रिकेटरों के बारे में यह कहा जा सकता है कि खेल में उनका कोई दुश्मन नहीं था। रहाणे उन्हीं चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्हें साथी खिलाड़ियों, विरोधियों और क्रिकेट प्रेमियों से समान रूप से सम्मान मिला।

अपने शांत व्यवहार, निस्वार्थ खेल और टीम को व्यक्तिगत उपलब्धियों से ऊपर रखने वाले रहाणे क्रिकेट को सिर ऊंचा करके अलविदा कह रहे हैं।

उनका बल्लेबाजी रिकॉर्ड हमेशा चर्चा में रहेगा, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में 36 रन पर ऑलआउट होने के बाद भारतीय टीम को संभालकर गाबा तक पहुंचाने वाला उनका नेतृत्व भारतीय क्रिकेट इतिहास में हमेशा अमर रहेगा।

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